Wednesday, January 20, 2010

RAHI TU CHALTA RAHA

राही तु चलता रहा
मॆ चला था देखने इस सारे सन्सार को
हिमालय की चोटी,तो गन्गा की धार को.
हिमालय था दुखी की कद मेरा घटने लगा
बर्फ़ का जो है लिबादा क्यु झडने लगा.
पुछा उसने मुझसे सुरज क्यु इतना तपता है
क्यु इसकी आग मै जिस्म यु झुलस्ता है .
क्या कहता उस्से करनी ये किसकी है
सामने है जो खडा वो भी इसका दोषी है.
फ़िर जो देखी मैने वो गन्ग की धार थी
जिसकी मैली हो चुकी हर एक किनार थी.
जो कभी अम्रित की धार थी वहि आज मल का द्वुर थी
देख ये हाल मेरे मन मै मची हा-हा कार थी.
इसे रोकने का आया है अब वक्त फ़िर उठी ये लल्कार थी
हा फ़िर उठी ये लल्कार थी.

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