आज मुझॆ मेरा घर याद आया है
आज यूँ बैठे बैठे मुझे अपना घर क्यों याद आया
माँ जो लगाती थी बिछोना क्यों याद आया.
याद आया क्यों मुझे घर का वो आंगन,
माँ जहाँ रोज़ खिलाती थी मुझे माखन.
गुलमोहर का वो पेड़ भी तो याद आया है,
जिसके छाया में मैंने अपना बचपन गुज़ारा है
याद आया है वो गुलमोहर पर लगा झुला ,
सोता था जिस पर मैं चिन्ताओ को भूला..
पापा का कंधो पर बैठना भी याद आया है
हँसता मुस्कुराता बचपन भी याद आया है
..कटी पतंग के पीछे भागना याद आया है,
टूटी जो डोर उससे बंधना भी याद आया है..
रिश्तो में पड़ी खटास याद आई है,
आपस में होती वो तकरार याद आई है..
टूटना ,फिर जुड़ना,जुड़ कर बिछड़ना ,
रिश्तो का एसा संसार याद आया है..
आज मुझे मेरा घर याद आया है
आज मुझे मेरा घर याद आया है
nice poem , ise pad kar... mujhe bhi apna ghar yaad aaya hai.
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