Wednesday, January 20, 2010

Ek din subha ka manzar kuch aysa tha

एक दिन सुभह का मन्जर कुछ ऐसा था
एक दिन सुबह उठा तो चारो ओर अन्धेरा था.
ऐसा लगा जैसे उगते सूरज को जलते घरो से निकले धुऎ ने घेरा था.
.था.चीखो से सबकी मेरा दिल धहला-धहला..
जाहा देखा वही खून का रेलम पेला था
.कौन हिन्दु कौन मुस्लिम ये ना उन लोगो ने देखा था...
हन्नुम के उन पेहरेदारो ने मासूम बच्चो को भी नही छोडा था
.. ऐसा मज्रर देखकर ये सवाल मेरे दिल मे खोला था..
कि आखिर मझहब के नाम पे किसने किसको लूटा था...
क्यू नही जानते है लोग प्यार की बोली ..
आखिर क्यू खेलते ह बार बार ये खून की होली

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