तुम
कहा से शुरु करु ओर कहा खत्म नही जानता
ऐसी एक सुन्हरी किताब हो तुम
ह्नसी ना आयॆ किसी के चहरे पर तो
उस चहरे कि मुसकुराहट हो तुम
पहली बारीश पर जब धरती मह्के
वो भिनी-२ खुशबु हो तुम
रात घिरे पर जब चान्द निकले
उस चान्द कि चान्दनी हो तुम
अपनी पहली फ़सल को देख जब किसान गुनगुनाये
उसकि अनकहि सरगम हो तुम
मुस्कुराना शायद कुछ ना हो तुम्हारे लिये
पर किसी कि जिन्दगी कि मुस्कान हो तुम
खुद को समझ पाई या नहि तुम ये नहि जानता
पर किसी के लिये अधुरा अन्सुना सपना हो तुम
पतन्गा आ कर बार-२ खुद को समर्पित कर जाये
उस दिये कि बाती हो तुम
जलना शायद कुछ ना हो तुम्हारे लिये
पर किसी कि जिन्दगी कि रोशनी हो तुम
महक उटॆ धरती वो एक बरसात हो तुम
रोशन कर दे जर्रा-२ वो पुनम कि रात हो तुम
तपती धुप मे जो हम पर छाया कर जाये
वो बद्ली की धार हो तुम
मेरी छोटी सी जिन्दगी का सबसे ह्न्सी हिस्सा हो तुम
यादो के भन्वर मे जो थामे रहा वो एक किस्सा हो तुम
सुबह की पहली किरन के साथ आने वाला पहला खयाल हो तुम
हजारो चहरो मे खोये चहरो को गोर से देखो किसी एक के लिये जीवन का दर्पन हो तुम
धीरज शर्मा
No comments:
Post a Comment