Wednesday, January 20, 2010

TUM

तुम

कहा से शुरु करु ओर कहा खत्म नही जानता
ऐसी एक सुन्हरी किताब हो तुम
ह्नसी ना आयॆ किसी के चहरे पर तो
उस चहरे कि मुसकुराहट हो तुम
पहली बारीश पर जब धरती मह्के
वो भिनी-२ खुशबु हो तुम
रात घिरे पर जब चान्द निकले
उस चान्द कि चान्दनी हो तुम
अपनी पहली फ़सल को देख जब किसान गुनगुनाये
उसकि अनकहि सरगम हो तुम
मुस्कुराना शायद कुछ ना हो तुम्हारे लिये
पर किसी कि जिन्दगी कि मुस्कान हो तुम
खुद को समझ पाई या नहि तुम ये नहि जानता
पर किसी के लिये अधुरा अन्सुना सपना हो तुम
पतन्गा आ कर बार-२ खुद को समर्पित कर जाये
उस दिये कि बाती हो तुम
जलना शायद कुछ ना हो तुम्हारे लिये
पर किसी कि जिन्दगी कि रोशनी हो तुम
महक उटॆ धरती वो एक बरसात हो तुम
रोशन कर दे जर्रा-२ वो पुनम कि रात हो तुम
तपती धुप मे जो हम पर छाया कर जाये
वो बद्ली की धार हो तुम
मेरी छोटी सी जिन्दगी का सबसे ह्न्सी हिस्सा हो तुम
यादो के भन्वर मे जो थामे रहा वो एक किस्सा हो तुम
सुबह की पहली किरन के साथ आने वाला पहला खयाल हो तुम
हजारो चहरो मे खोये चहरो को गोर से देखो किसी एक के लिये जीवन का दर्पन हो तुम
धीरज शर्मा

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