नींद सी आँखों में घुलने लगी,
सपनों की दुनिया पिघलने लगी,
बातों ही बातों में, बस कुछ मुलाकातों में,
एक तसवीर सपनों में दिखने लगी,
चेहरा था उसमें एक प्यारा सा,
कुछ जाना, कुछ अनजाना सा,
वो चेहरा क्यों मुझको सताने लगा,
आकर रातों में मुस्कुराने लगा,
मुस्कुराती वो आई, थामी जो कलाई,
ऐसा लगा बस आँखें भर आईं,
प्यार इतना कभी देखा ना था,
पर जब आँखें खुली तो कोई ना था,
था तो बस मैं और मेरी तन्हाई,
दिल रोया मेरा, बस आवाज ना आई...
No comments:
Post a Comment