भोर का सूरज थी मेरी जिंदगी,
हर दिन एक नई उमंग थी मेरी जिंदगी,
पंछी जो गाये संगीत थी मेरी जिंदगी,
मैं कवि और कविता थी मेरी जिंदगी,
रंगों में घुली थी मेरी जिंदगी,
एक ऐसी रंगोली थी मेरी जिंदगी,
फ़िर वो रात का पहर आया और खोता रहा मेरा साया,
रंगों की होली भी गुम हो गयी,
कविता भी पन्नों में कहीं खो गयी,
मैं गुमसुम अकेले इस ओर रह गयी,
सोचते हुए ही मैं उस रात सो गई,
और जब उठी तो देखा फ़िर एक नई भोर हो गई,
वो भोर नहीं शुरुवात एक और हो गई..
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